नई दिल्ली– केंद्र सरकार कोरोना-लॉकडाउन की वजह से पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारतीयों की खर्च करने की क्षमता बढ़ाना चाहती है। इसके लिए उसने अपने लाखों कर्मचारियों के लिए दो बड़ी घोषणाएं की हैं। केंद्रीय कर्मचारियों से कहा गया है कि कोविड की वजह से त्योहारों पर यात्राएं मुमकिन नहीं है तो वह एलटीसी भत्ते का इस्तेमाल खरीदारी के लिए कर सकते हैं। इसके साथ ही सरकार ने एक बार के लिए फेस्टिवल एडवांस देने की भी घोषणा की है। यह सुविधा संगठित क्षेत्र के वेतनभोगी कर्मचारियों और राज्यों के कर्मचारियों तक भी बढ़ा दी गई है। सरकार का मकसद सिर्फ एक है। लोग खर्च करें, मांग बढ़ाएं तो अर्थव्यवस्था भी चल पड़ेगी। लेकिन, सवाल है कि क्या ये उपाय जरूरत के मुताबिक मांग बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं।

मौजूदा एलटीसी पॉलिसी के तहत केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों के अलावा कुछ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को 4 साल में एक बार भारत के किसी एक जगह यात्रा के लिए और दो बार अपने होमटाउन जाने के लिए रियायतें मिलती हैं। कर्मचारियों को उसकी श्रेणी के मुताबिक यात्रा किराए का भुगतान किया जाता है। इस रकम पर कोई टैक्स नहीं लगता। एलटीसी के दूसरे हिस्से में 10 दिन तक की छुट्टी (अर्न्ड लीव ) के बदले कैश लेने का भी प्रावधान है। अर्न्ड लीव भुनाने पर टैक्स का प्राधान है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो एलटीसी वाउचर स्कीम की घोषणा की है उसके मुताबिक कर्मचारी यात्रा किराए से तीन गुना तक खर्च कर सकते हैं। लेकिन, इसकी शर्त है कि वह इन पैसों से वही सामान खरीद सकते हैं, जिसपर 12फीसदी जीएसटी लगता है। भुगतान भी डिजिटली होना है। लेकिन, वित्त सचिव अजय बी पांडे ने एक सवाल के जवाब में कहा है कि किराए पर मिलने वाली टैक्स रियायत किराए (किराए के तीन गुना खर्च करने की छूट है) के एक ही भाग तक मिलेगा।
सरकार ने इस बार एक बार के लिए स्पेशल फेस्टिवल ए़डवांस देने की भी घोषणा की है। सातवें वेतन आयोग के पहले यह स्कीम लागू थी। इसके तहत केंद्रीय कर्मचारियों को 10,000 रुपये बिना ब्याज के एडवांस मिलेगा, जिसे वो 10 बराबर किश्तों में लौटाएंगे। लेकिन, यह पैसे भी कैश में नहीं मिलेंगे। यह RuPay कार्ड में पहले से लोडेड रकम की तौर पर रहेंगे, जिसे अगले साल 31 मार्च से पहले तक खर्च कर सकते हैं। कर्मचारी अगर इसका इस्तेमाल नहीं कर पाए तो तय तारीख के बाद यह लैप्स हो जाएंगे। जानकारों की मानें तो सरकार ने डिमांड बढ़ाने के लिए जितना अपना खजाना खोला है, उससे कहीं ज्यादा उसकी कोशिश है कि लोग अपनी जेब ज्यादा ढीली करें। इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट में इंडिया रेटिंग्स और रिसर्च के अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने कहा है, ‘इसका बहुत ही सीमित असर पड़ेगा।……..कोई अतिरिक्त मांग नहीं बढ़ेगी। हालांकि, ये उपाय अगर लोगों की भावनाओं में सुधार करते हैं, जो कि अभी नीचे है, तो मांग बढ़ सकती है। ‘
जानकारों का यह भी मानना है कि इस स्कीम के चलते कर्मचारियों को टैक्स बचाने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। ऐसे में जब मौजूदा एलटीसी ब्लॉक के चार साल की मियाद दिसंबर, 2021 में पूरी हो रही है तो लोग एलटीसी लेने के लिए मार्च के बाद का भी इंतजार कर सकते हैं। तब तक हो सकता है कि कोरोना का कहर भी कुछ कम हो जाए और आवागमान भी सुगम हो जाए। वैसे वित्त मंत्री का दावा है कि इन दोनों स्कीम से 36,000 करोड़ रुपये की डिमांड पैदा होगी।
मोदी सरकार ने कैश की किल्लत झेल रहे राज्यों में खपत और मांग बढ़ाने के लिए भी एक घोषणा की है। इसके तहत राज्यों को 50 साल की अवधि के लिए 12,000 करोड़ रुपये के खर्च के लिए विशेष ब्याज-मुक्त लोन देने की बात कही गई है। इसमें से 2,500 करोड़ रुपये उत्तर-पूर्व और उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लिए है और बाकी 7,500 करोड़ रुपये दूसरे राज्यों के लिए रखा गया है। लेकिन, अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह नवीन प्रयास है, लेकिन इससे आर्थिक गतिविधि पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा।